अंधेर नगरी

अंधेर नगरी

"अंधेर नगरी" कविता की सारांश:

भारतेंदु हरिश्चंद्र की कविता "अंधेर नगरी" समाज और शासन व्यवस्था की व्यंग्यात्मक आलोचना है। इस कविता में लेखक ने एक काल्पनिक नगर "अंधेर नगरी" का चित्रण किया है, जहाँ सब कुछ उल्टा-पुल्टा और अनियंत्रित है।

कविता में बताया गया है कि इस नगरी में कानून और व्यवस्था की कोई स्थिति नहीं है। यहाँ पर अच्छे काम करने वालों को दंड मिलता है, जबकि बुरे काम करने वाले फलते-फूलते हैं। समाज में जितनी भी बुराई है, वह यहाँ सामान्य मानी जाती है और जो भी सही काम करता है, उसे गलत ठहराया जाता है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी व्यक्ति ने चोरी की तो वह सम्मानित होता है, और जो सच्चाई का समर्थन करता है, उसे दंड मिलता है।

यह कविता समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, अन्याय और असमानता पर करारा प्रहार करती है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इस कविता के माध्यम से लोगों को सचेत किया कि जब तक हम इन व्यवस्थाओं को सुधारने के लिए आवाज नहीं उठाएंगे, तब तक ऐसे ही अंधेर नगरी का सामना करना पड़ेगा।

कविता "अंधेर नगरी" ने समाज में व्याप्त कुरीतियों और अनियंत्रित शासन व्यवस्था को उजागर करते हुए सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता का संदेश दिया।